जल प्रदूषण

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Posted by Sonia | Posted in जल ही जीवन | Posted on 26-06-2009

पृथ्वी की सतह पर 70% से अधिक पानी शामिल है, पानी हमारे ग्रह पर मौजूद सबसे बहुमूल्य प्राकृतिक संसाधन है| अमूल्य मिश्रित हाइड्रोजन और ऑक्सीजन, के बिना पृथ्वी पर जीवन अस्तित्वहीन है, यह हमारे ग्रह पर कुछ भी विकसित करने के लिए आवश्यक है| यद्यपि हम मनुष्य इस तथ्य को पहचान कर भी हम  नदियों, झीलों, महासागरों में प्रदूषण को धीरे धीरे लेकिन निश्चित रूप से हम अपने ग्रह को नुकसान पहुँचाते जा रहे हैं। जल प्रदूषण से मासूम जीवो के मरने के अलावा हमारे पीने के पानी को भी काफी प्रभावित किया है। जल प्रदूषण से निपटने के लिए हमे समस्याओं को समझना चाहिए और इसके समाधान का हिस्सा बनना चाहिए। जल प्रदूषण होता है जब जल मे अघिक मात्रा मे प्रदूषित पदार्थ जल मे मिल जाते है और वह पानी उपयोग के लिए प्रदूषित पानी अयोग्य माना जाता है|

पानी को प्रदूषित करने के दो मुख्य स्त्रोत निम्न प्रकार के होते हैं: १) केन्द्र स्रोत २) अकेन्द्र स्रोत
केन्द्र स्रोत: केन्द्र स्रोत प्रदूषण जब होता है जब हानिकारक पदार्थ सीधे पानी में उत्सर्जित होते है|
अकेन्द्र स्रोत: परोक्ष पर्यावरणीय परिवर्तन के माध्यम से जल प्रदूषण|

प्रदूषण के कई कारण जैसे मलजल, और उर्वरकों मे nitrates और फॉस्फेट तत्व होते है। nitrates और फॉस्फेट पौधों और शैवाल के लिये पोषक तत्व होते है ये जलीय पौधों और शैवाल के विकास को अधिक प्रोत्साहित करते है, इन जीवो की अत्यधिक वृद्धि के फलस्वरूप हमारे जलमार्ग रुक जाते है. और गहरे पानी मे प्रकाश के प्रवेश को रोक देते है. जो कि जलीय जीवो के लिये बहुत हानिकारक साबित हो रहे है, पानी में रहने वाले जीव जैसे मछली और अन्य invertebrates की श्वास क्षमता को भी प्रभावित करते है। गाद और अन्य निलंबित ठोस भी प्रदूषण का कारण होते है जैसे मिट्टी, निर्माण साइटे, शहरी क्षेत्रों। प्रदूषण कार्बनिक पदार्थ के रूप मे जलमार्ग में प्रवेश करता है जैसे मल के रूप में, घास की कतरनों, मरे हुए पशु-पक्षियों आदि, जब प्राकृतिक जीवाणु और प्रोटोजोआ कि मात्रा अधिक हो जाती है तब ये ऑक्सीजन की पूर्ति के लिये पानी को भंग कर उपयोग करना शुरू कर देते है, जिससे मछली और नीचले जल स्तर के कई प्रकार के जीवो को प्रयाप्त मात्रा मे ऑक्सीजन नही मिल पाती।

तापमान मे वृद्धि

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Posted by Sonia | Posted in ग्लोबल वार्मिंग | Posted on 25-06-2009

पिछले 100 वर्षों से, पृथ्वी की सतह के निकट हवा का औसत तापमान कम से कम 1 डिग्री सेल्सियस बढ़ गया है.(1.3 ± 0.32 ° फेरनहाइट) (0.74 ± 0.18 डिग्री सेल्सियस). बस इतना ही नहीं, यह तूफान में विशिष्ट वृद्धि, बाढ़ और भड़के हुए जंगल की आग के लिए जिम्मेदार है, वैज्ञानिकों के अनुसार पृथ्वी के तापमान मे एक डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हुई है। अभी तक के रिकार्ड के अनुसार.पिछले आठ सालो में तीन साल सबसे गर्म हुए है. लेकिन सोचने कि बात ये नही है कि पृथ्वी कितनी गर्म है, सोचने कि बात यह कि पृथ्वी कितनी जल्दी गर्म हो रही है| पृथ्वी पर हमेशा से प्राकृतिक जलवायु परिवर्तित होती रही है। बर्फ युग से गर्म मध्यवर्ती युग 50000 से 100000 वर्ष की अवधि में विकसित हुआ| पृथ्वी के तापमान मे जितनी वृद्धि पिछ्ले 30 वर्षों मे हुई है वेसी अभी तक नहीं हुई है| इसके अलावा, ये अवधि अब सामान्य रूप से पृथ्वी के ठंडे होने की है, प्राकृतिक प्रभाव के अनुसार सौर चक्र और ज्वालामुखी गतिविधि हीटिंग-चरण मे नहीं है| इन सभी तथ्यों को वैज्ञानिकों ने बताया है कि ग्लोबल वार्मिंग एक प्राकृतिक घटना नहीं है और अनुमान है कि इसे प्राकृतिक कारणों से नहीं लाया गया है|